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Another Year


AnotherYear

Another Year ahead…
Confused!
The route of water,
Or the sky?
To swim across,
Or to fly?

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When the Sky Cries


When the Sky Cries

ये गम तो मुझे नसीब हुआ है…

ये आसमां क्यूँ इतना रो रहा है


रात चाँद और मैं


raat chand aur main

 

रात चाँद और मैं
तीनों
छुपते फिरते हैं
इक दूसरे से

और छुप-छुप कर
ताका भी करते हैं
इक दूसरे को

रोज़ का खेल है ये

चाँद तो फिर भी
बेमन से आता है कई बार
अधूरा-अधूरा सा
और कभी-कभी तो
आता ही नहीं
लेकिन रात
रात हमेशा आती है
बिना नागा किये

फिर
खेलना पड़ ही जाता है
रोज़ का खेल

और जब थक जाते हैं
खेलते-खेलते
तब हार कर
प्रयोग कर ही लेते हैं
अपने अपने ब्रह्मास्त्रों का

फिर रात दिखती है
मद्धम-मद्धम
मलिन होती हुई
सूर्य की लालिमा से

और चाँद दिखता है
धीरे-धीरे
दूर क्षितिज पर
धरा में समाते हुए

और मैं
मैं हर बार
तलाशने लगता हूँ
कि कैसे खेलना है
ये खेल अगली बार

कितना  अच्छा होता अगर
मैं भी कतरा-कतरा
खंडित हो पाता
किसी की लालिमा से
मैं भी समा पाता
मद्धम-मद्धम
किसी धरा में

कितना आसान है ना
उन दोनों के लिए
छुपना दिन के उजालों में


What is Enough for them?


What is Enough

 

Love! Just Love?

Well,

That’s not Enough!

Few also want

some more stuff

in the Sky.

For them,

the Clouds

are not Enough!


वो ऐसा क्यूँ है…


woh aisa kyun hai

क्या है कुछ
लेकिन पता नहीं
एक रोष सा
एक खेद सा
भरा हुआ है कहीं
लबालब ऊपर तक
आंच पे रखे
दूध सा उबलता
बाहर आने को बेकरार
जाने किस मलाली में हाथ मलता
बस ढूँढ रहा है
गिरने को कोई सतह
कहाँ गिरे
किसपे गिरे
यही सोच रहा है बस
वजह भी मालूम नहीं
या वजह शायद गुम है कहीं
कई दफे कोशिश की
अंदर झाँकने की
गहराई तक जाकर
कुछ पाने की
तलहटी तक पहुंचा
जब भी
विस्मय और दुविधा
ही मिली
परेशां है खुद से
वो ऐसा क्यूँ है
जब चाहता नहीं वैसा
तो वैसा क्यूँ है
यूँ होता तो क्या होता
न होता मैं तो क्या होता

Pic Info: Statue of faceless man outside the famous Estates Theater in Prague, Czech Republic.


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