Being Rekha


Have you ever thought of how does it feel to be Rekha? The Rekha of Amitabh.

Rekha and Amitabh Bachchan were first cast opposite each other in Do Anjaane. Apparently, that’s what Amitabh wants them to be now.

BeingRekha

They might have loved each other and while Rekha never denied this, Amitabh never accepted this relationship. And not only this, he walked out of it, married someone else to lead a happy life. Of course at the cost of someone. A castle built on the ruins of someone’s heart. Afraid of fighting, even for himself, he chose the easy path, and an advantageous one too.

Amitabh married Jaya Bhaduri when he was slowly rising to star status and was not actually a super star. During that time Jaya was an established actress and marriage with her helped him a lot with positive publicity and foothold in bollywood. He became the ultimate star, a star far enough for Rekha to reach to.

And what did Rekha got? All she was left with is to try to present herself in a totally different way, hiding all that going on inside and fighting alone, with herself, in those lonely nights and illuminated yet dark days.

She loved him more than anything else in the world, but may be she was just an ego trip for him.

Rekha Ji! Though I wished you a happy birthday but I know its doesn’t make any sense because I know you can’t have one now, or for that matter, ever, you say it or not. However, I don’t need to wish a happy birthday to you too Amit Ji. Because I know you must be having one.

 

तुम तो अमित बन आगे निकल गए
और हम अकेले यहाँ रेखा बने रह गए


Wanted – An Escape


Wanted - An Escape

काटे चाहे जितना, परों से हवाओं को
खुद से न बच पायेगा तू…
तोड़ आसमानों को, फूँक दे जहानों को
खुद को छुपा न पायेगा तू…

~ इरशाद क़ामिल (नादान परिंदे – रॉकस्टार)


Barren Evening


Barren Evening

 

रात की सियाही कोई, आये तो मिटाये ना
आज ना मिटायी तो ये, कल भी लौट आयेगी
खाली हाथ शाम आयी है, खाली हाथ जायेगी
आज भी ना आया कोई, खाली लौट जायेगी

रात और दिन कितने खूबसूरत दो वक़्त हैं, और कितने खूबसूरत दो लफ्ज़। इन दो लफ़्ज़ों के बीच में, एक वक़फ़ा आता है, जिसे शाम का वक़्त कहते हैं। ये वो वक़्त है, जिसे न रात अपनाती है, न दिन अपने साथ लेकर जाता है। इस छोड़े हुए, या छूटे हुए लावारिस वक़्त से, शायर अक्सर कोई न कोई लम्हा चुन लेता है, और सी लेता है अपने शेरों में। लेकिन कोई-कोई शाम भी ऐसी बाँझ होती है, के कोई लम्हा देकर नहीं जाती।

~ गुलज़ार साहब


When the Sky Cries


When the Sky Cries

ये गम तो मुझे नसीब हुआ है…

ये आसमां क्यूँ इतना रो रहा है


Randomness…


Randomness

हवाएं कंघी करती हैं
बालों में
कुछ अजीब ही तरीके से
ज़िन्दगी में सब कुछ संजीदा
और सलीके से रखा
अच्छा भी तो नहीं लगता


Moving On…


Moving On

 

 
He – You are like a star to me.
She – Because you see me twinkling?
He – No, because you are quite far away from me.
She – Damn! OK! We both said ‘I Love You’ to each other. Why can’t you move on like me?
He – You just said it, I meant it.

 


रात चाँद और मैं


raat chand aur main

 

रात चाँद और मैं
तीनों
छुपते फिरते हैं
इक दूसरे से

और छुप-छुप कर
ताका भी करते हैं
इक दूसरे को

रोज़ का खेल है ये

चाँद तो फिर भी
बेमन से आता है कई बार
अधूरा-अधूरा सा
और कभी-कभी तो
आता ही नहीं
लेकिन रात
रात हमेशा आती है
बिना नागा किये

फिर
खेलना पड़ ही जाता है
रोज़ का खेल

और जब थक जाते हैं
खेलते-खेलते
तब हार कर
प्रयोग कर ही लेते हैं
अपने अपने ब्रह्मास्त्रों का

फिर रात दिखती है
मद्धम-मद्धम
मलिन होती हुई
सूर्य की लालिमा से

और चाँद दिखता है
धीरे-धीरे
दूर क्षितिज पर
धरा में समाते हुए

और मैं
मैं हर बार
तलाशने लगता हूँ
कि कैसे खेलना है
ये खेल अगली बार

कितना  अच्छा होता अगर
मैं भी कतरा-कतरा
खंडित हो पाता
किसी की लालिमा से
मैं भी समा पाता
मद्धम-मद्धम
किसी धरा में

कितना आसान है ना
उन दोनों के लिए
छुपना दिन के उजालों में


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